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बर्बरीक की कथा - बर्बरीक के खाटूश्यामजी के नाम से पूजे जाने के पीछे एक कथा है. इस कथा के अनुसार बर्बरीक पांडू पुत्र महाबली भीम के पौत्र थे. इनके पिता का नाम घटोत्कच एवं माता का नाम कामकंटका (कामकटंककटा, मोरवी, अहिलावती) था.

उन्होंने वाल्मीकि की तपस्या करके उनसे तीन अभेद्य बाण प्राप्त किए थे. हारने वाले पक्ष की सहायता करने के उद्देश्य से नीले घोड़े पर सवार होकर ये कुरुक्षेत्र के युद्ध में भाग लेने के लिए आए.

भगवान कृष्ण ने ब्राह्मण के वेश में एक तीर से पीपल के सभी पत्तों को छिदवाकर इनकी शक्तियों को परखा. बाद में दान स्वरुप इनका शीश मांग लिया. फाल्गुन माह की द्वादशी को बर्बरीक ने कृष्ण को अपने शीश का दान दे दिया.

कृष्ण ने बर्बरीक को कलयुग में अपने नाम से पूजे जाने का वरदान दिया. युद्ध समाप्ति के पश्चात बर्बरीक का शीश रूपवती नदी में बहकर खाटू ग्राम में आ गया. सत्रहवी शताब्दी में खट्टवांग राजा के काल में खाटू ग्राम में एक गाय के थनों से श्याम कुंड वाली जगह पर अपने आप दूध बहने की वजह से जब खुदाई की गई तो वहाँ बर्बरीक का शीश निकला.

राजा खट्टवांग ने 1720 ईस्वी (विक्रम संवत 1777) में बर्बरीक के शीश की मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा करवाई. बाद में बाबा श्याम के मंदिर की वजह से यह गाँव खाटूश्यामजी के नाम से प्रसिद्ध हो गया.

बाबा श्याम को श्याम बाबा, तीन बाण धारी, नीले घोड़े का सवार, लखदातार, हारे का सहारा, शीश का दानी, मोर्वीनंदन, खाटू वाला श्याम, खाटू नरेश, श्याम धणी, कलयुग का अवतार, दीनों का नाथ आदि नामों से भी पुकारा जाता है.

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